संस्कृतसप्ताह पर विशेष –
भारतीय ज्ञान परम्परा की संवाहक वैज्ञानिक भाषा संस्कृतSanskrit
प्रो.अनेकांत कुमार जैन
संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा का नाम नहीं है। यह भारतीय ज्ञान-परंपरा की ऐसी सशक्त धारा है, जिसमें भाषा, व्याकरण, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, संस्कृति और जीवन-दृष्टि-इन सभी का समन्वय दिखाई देता है । इसलिए संस्कृत पर विचार करते हुए हमारे सामने केवल यह प्रश्न नहीं होना चाहिए कि संस्कृत कितनी पुरानी है ? बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि संस्कृत ने मनुष्य के विचार और ज्ञान को किस प्रकार प्रभावित किया है और आज उसके अध्ययन की प्रासंगिकता क्या है ?Sanskrit
संस्कृत का संबंध हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की अनेक भाषाओं से माना जाता है। लैटिन, यूनानी, जर्मन, ईरानी और स्लाविक आदि भाषाओं के साथ संस्कृत के अनेक मूलभूत शब्दों और भाषिक संरचनाओं में साम्य दिखाई देता है।Sanskrit
इससे हमें यह समझने का अवसर मिलता है कि भाषाओं का विकास अलग-अलग द्वीपों की तरह नहीं हुआ, बल्कि उनके पीछे एक दीर्घ और जटिल भाषिक इतिहास रहा है।भारत के संदर्भ में संस्कृत का महत्व और भी व्यापक हो जाता है।भारत अनेक भाषा-परिवारों का देश है। हिन्द-आर्य, द्रविड़, ऑस्ट्रिक तथा चीन-तिब्बती आदि भाषा-परिवारों की भाषाएँ यहाँ बोली जाती हैं।Sanskrit
आधुनिक भारतीय भाषाओं के शब्द-भंडार और साहित्यिक परंपरा में संस्कृत का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है । हिन्दी, मराठी, गुजराती, बंगाली, ओड़िया, असमिया, कश्मीरी, मैथिली, पंजाबी, राजस्थानी और कोंकणी आदि भाषाओं में संस्कृत के असंख्य शब्द आज भी हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। संस्कृत का प्रभाव उन भाषाओं पर भी दिखाई देता है जो सीधे संस्कृत से विकसित नहीं हुईं।Sanskrit
संस्कृत को समझना केवल एक प्राचीन भाषा को समझना नहीं है; यह भारत की अनेक भाषाओं, साहित्यिक परंपराओं और सांस्कृतिक स्मृति को समझने का भी एक माध्यम है।लेकिन संस्कृत की विशिष्टता केवल उसकी प्राचीनता और साहित्यिक समृद्धि में नहीं है।उसकी एक बड़ी शक्ति है-उसका व्याकरण। महर्षि पाणिनि ने संस्कृत की भाषा-व्यवस्था को जिस सूक्ष्मता और नियमबद्धता के साथ प्रस्तुत किया, वह भारतीय भाषाशास्त्र की असाधारण उपलब्धि है।Sanskrit
पाणिनि की अष्टाध्यायी केवल भाषा के नियमों का संग्रह नहीं है। वह भाषा की संरचना को अत्यंत संक्षिप्त, तार्किक और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है। आधुनिक भाषाविज्ञान में भी पाणिनि के व्याकरण को इसी कारण गंभीर अध्ययन का विषय माना जाता है।संस्कृत की शब्द-रचना, विभक्ति-व्यवस्था, समास, संधि और क्रिया-रूप भाषा को एक अत्यंत व्यवस्थित संरचना प्रदान करते हैं।Sanskrit
एक शब्द केवल अपना मूल अर्थ नहीं रखता; वाक्य में उसके संबंध के अनुसार उसका रूप बदलता है। एकवचन और बहुवचन के साथ संस्कृत में द्विवचन की भी स्वतंत्र व्यवस्था है।जो प्राकृत हिंदी अंग्रेजी आदि भाषाओँ में नहीं है अतः यहाँ संस्कृत की वैज्ञानिक दृष्टि का एक सुंदर उदाहरण हमारे सामने आता है। मान लीजिए हमारे सामने शब्द है-राम। इसके द्विवचन के विभिन्न रूप हैं – रामौ, रामाभ्याम्, रामयोः।Sanskrit
ये केवल व्याकरण की दृष्टि से तीन रूप नहीं हैं। इनके उच्चारण में होने वाले शारीरिक प्रयत्नों पर भी विचार किया जाना चाहिए और इन्हें योग की तीन प्रक्रियाओं मूलबन्ध, उड्डियानबन्ध और जालन्धरबन्ध से जोड़कर देखना चाहिए । हम पायेंगे कि ‘रामौ’ का उच्चारण मूलबन्ध से , ‘रामाभ्याम्’ का उड्डियानबन्ध से और ‘रामयोः’ का जालन्धरबन्ध से संबंध है। अब इस परंपरागत विचार को हम केवल विश्वास के रूप में स्वीकार कर लें यह एक दृष्टि है; लेकिन इसे अनुसन्धान का प्रश्न बना दें,तो यह और भी रोचक हो जाता है।
योग विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए यह शोध का विषय होना चाहिए कि क्या इन संस्कृत रूपों के उच्चारण में वास्तव में ऐसे शारीरिक प्रयत्न होते हैं जो योग में वर्णित इन बन्धों के प्रयत्नों से तुलनीय हैं?
क्या इनके उच्चारण के समय श्वास की गति बदलती है ? क्या श्वास की अवधि, वायु-प्रवाह, स्वर-आवृत्ति, मुख और नासिका से होने वाला वायु-प्रवाह अथवा अन्य शारीरिक संकेतकों में कोई मापनीय परिवर्तन होता है ? और यदि परिवर्तन होता है, तो क्या वह अलग-अलग ध्वनियों के साथ पुनः-पुनः समान रूप से दिखाई देता है? यही वह बिंदु है जहाँ संस्कृत, ध्वनिविज्ञान, शरीर-विज्ञान और योग-विज्ञान एक साथ आ सकते हैं।Sanskrit
इस तरह का अध्ययन प्रशिक्षित संस्कृत वक्ताओं और प्रशिक्षित योग-साधकों पर किया जा सकता है। नियंत्रित परिस्थितियों में ‘रामौ’, ‘रामाभ्याम्’ और ‘रामयोः’ जैसे रूपों का उच्चारण कराया जाए; दूसरी ओर संबंधित योगिक प्रक्रियाओं का अभ्यास कराया जाए; और दोनों स्थितियों में श्वसन तथा अन्य शारीरिक संकेतकों का वैज्ञानिक मापन किया जाए। तब हम यह जान सकेंगे कि परंपरा द्वारा स्थापित यह संबंध केवल सांस्कृतिक-सैद्धांतिक समानता है या इसके पीछे कोई मापनीय शारीरिक समानता भी है।
मेरे विचार से यही संस्कृत-अध्ययन की वास्तविक वैज्ञानिक दृष्टि है। जहाँ परंपरा ने कोई प्रश्न छोड़ा है, वहाँ आधुनिक अनुसंधान उस प्रश्न को उठाए; जहाँ प्रमाण उपलब्ध हैं, वहाँ उन्हें स्वीकार करे; और जहाँ प्रमाण अभी नहीं हैं, वहाँ उन्हें खोजने का प्रयास करे।
इसी प्रकार संस्कृत के अनुस्वार और विसर्ग भी अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण विषय बन सकते हैं। अनुस्वार की ध्वनि नासिक्य प्रकृति की है और विसर्ग में स्वर के बाद एक विशिष्ट श्वास-आधारित ध्वनि आती है। आधुनिक संस्कृत-शिक्षण में भी इन दोनों की अलग ध्वन्यात्मक प्रकृति स्पष्ट रूप से बताई जाती है।Sanskrit
भारतीय परंपरा में अनुस्वार को भ्रामरी और विसर्ग को कपालभाति जैसी श्वास-प्रक्रियाओं से जोड़े जाने की बात मिलती है। इसे भी हम एक वैज्ञानिक प्रश्न में बदल सकते हैं। क्या अनुस्वार के उच्चारण से वास्तव में श्वसन-पद्धति में कोई विशिष्ट परिवर्तन उत्पन्न होता है? क्या विसर्ग के उच्चारण में श्वास-त्याग का कोई ऐसा पैटर्न है जिसकी तुलना किसी विशेष प्राणायाम-प्रक्रिया से की जा सके? क्या लंबे समय तक संस्कृत के नियंत्रित उच्चारण का अभ्यास करने वाले व्यक्तियों में श्वसन-संबंधी कोई मापनीय अंतर दिखाई देता है? इन प्रश्नों का उत्तर अनुमान से नहीं, प्रयोग से मिलना चाहिए।
और यही संस्कृत को लेकर हमारी दृष्टि होनी चाहिए। संस्कृत की वैज्ञानिकता का अर्थ यह नहीं कि हम उसके प्रत्येक पारंपरिक कथन को बिना परीक्षण के वैज्ञानिक सत्य घोषित कर दें। वैज्ञानिकता का अर्थ है नियमबद्धता, निरीक्षण, तर्क, परीक्षण और पुनरावृत्ति।
इस दृष्टि से संस्कृत की ध्वनि-व्यवस्था स्वयं अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारतीय भाषाशास्त्रियों ने वर्णों के उच्चारण-स्थान और उच्चारण-प्रयत्न का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण किया। कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त और ओष्ठ आदि के आधार पर ध्वनियों का वर्गीकरण किया गया। प्राचीन भारतीय शिक्षाग्रंथों और प्रातिशाख्य परंपराओं में वैदिक उच्चारण और पाठ के अत्यंत सूक्ष्म विवरण मिलते हैं। आधुनिक विद्वान भी प्राचीन भारतीय ध्वनिविज्ञान को एक स्वतंत्र और विकसित भाषिक परंपरा के रूप में अध्ययन करते हैं।
यहाँ हमें एक और अद्भुत बात दिखाई देती है। ज्ञान की परंपरा मूलतः श्रुति और मौखिक परंपरा थी। इसलिए शब्द को केवल लिखकर सुरक्षित करना पर्याप्त नहीं था। स्वर, मात्रा, उच्चारण और पाठ-क्रम को सुरक्षित रखना आवश्यक था। इसी आवश्यकता ने अनेक पाठ-पद्धतियों को जन्म दिया। अर्थात् भारतीय मनीषियों के सामने हजारों वर्ष पहले ही एक समस्या थी कि ध्वनि को बिना विकृति के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक कैसे पहुँचाया जाए? इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने केवल स्मृति पर भरोसा करके नहीं दिया; उन्होंने उच्चारण और पाठ की व्यवस्थित पद्धतियाँ विकसित कीं। यही भारतीय ध्वनि-विज्ञान की एक बड़ी उपलब्धि है।Sanskrit
संस्कृत की संधि-व्यवस्था भी इसी वैज्ञानिक दृष्टि का उदाहरण है। दो ध्वनियाँ जब एक-दूसरे के निकट आती हैं तो उनका उच्चारण बदल सकता है। लेकिन यह परिवर्तन मनमाना नहीं होता। उसके पीछे निश्चित ध्वनि-नियम होते हैं। अर्थात् संस्कृत में भाषा का प्रवाह भी नियमबद्ध है और उसके भीतर होने वाला परिवर्तन भी नियमबद्ध है।
यह विशेषता आज के कम्प्यूटेशनल भाषाविज्ञान के संदर्भ में भी रोचक हो जाती है। जब हम किसी भाषा को कम्प्यूटर द्वारा समझाने का प्रयास करते हैं तो हमें नियम, संरचना, रूप-परिवर्तन और अपवादों को स्पष्ट रूप से पहचानना पड़ता है। इसीलिए संस्कृत की संरचनात्मक प्रकृति आधुनिक प्राकृतिक भाषा संसाधन और कम्प्यूटेशनल भाषाविज्ञान के लिए भी अध्ययन का विषय बनी हुई है।
लेकिन संस्कृत की वैज्ञानिकता को केवल कम्प्यूटर तक सीमित करना भी उचित नहीं होगा। संस्कृत में शब्द-रचना का अपना एक विशाल विज्ञान है। धातु, प्रत्यय, उपसर्ग, समास और विभक्ति के माध्यम से शब्दों के अर्थ और उनके पारस्परिक संबंधों को व्यक्त किया जाता है। इससे भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं रह जाती; वह एक व्यवस्थित अर्थ-व्यवस्था बन जाती है। और यही कारण है कि संस्कृत को समझने के लिए केवल शब्द याद करना पर्याप्त नहीं है। संस्कृत हमें यह भी सिखाती है कि शब्द कैसे बनता है, अर्थ कैसे बदलता है और वाक्य में संबंध कैसे निर्मित होता है। परंतु संस्कृत की सबसे बड़ी शक्ति न तो केवल उसका व्याकरण है, न केवल उसका ध्वनि-विज्ञान और न केवल उसकी प्राचीनता।Sanskrit
संस्कृत की सबसे बड़ी शक्ति है,उसमें निहित जीवन-दृष्टि।संस्कृत के साहित्य में आत्मचिंतन है। दर्शन में तर्क है। महाकाव्यों में जीवन-संघर्ष हैं। काव्य में सौंदर्य है। नीतिशास्त्र में व्यवहार-बोध है। योग-परंपरा में आत्मानुशासन है। इसलिए संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं है। वह एक ऐसी ज्ञान-परंपरा है जिसमें मनुष्य के बाहरी और आंतरिक दोनों विकास पर विचार किया गया है।Sanskrit
आज हमारे सामने प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि संस्कृत का गौरव कैसे सिद्ध किया जाए। प्रश्न यह होना चाहिए कि संस्कृत के इस विशाल ज्ञान-संसार को आज की पीढ़ी तक कैसे पहुँचाया जाए ? हम संस्कृत की प्रशंसा बहुत करते हैं, लेकिन संस्कृत पढ़ते कितना हैं? किसी भाषा के प्रति सम्मान केवल उसके गौरव का वर्णन करने से नहीं होता । भाषा तब जीवित रहती है जब वह पढ़ी जाती है, बोली जाती है, समझी जाती है, उस पर शोध होता है और उसे नए ज्ञान से जोड़ा जाता है।
इसलिए संस्कृत को केवल पूजा-पाठ की भाषा, केवल प्राचीन ग्रंथों की भाषा या केवल परीक्षा का विषय बनाकर नहीं रखा जाना चाहिए। हमें संस्कृत को आधुनिक शिक्षा, भाषाविज्ञान, दर्शन, कम्प्यूटर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मनोविज्ञान, योग, ध्वनिविज्ञान और अन्य अन्तर्विषयक क्षेत्रों से जोड़ना चाहिए तथा इसके लिए सबसे अधिक आवश्यक है अनुसन्धान। संस्कृत पर हमें केवल शोध नहीं करना है; संस्कृत के भीतर निहित ज्ञान-परंपराओं पर भी शोध करना है। यदि हमारी परंपरा कहती है कि किसी ध्वनि का शरीर पर प्रभाव पड़ता है,तो उसे मापा जाए। यदि परंपरा कहती है कि किसी उच्चारण का श्वास से संबंध है,तो उसका परीक्षण किया जाए। यदि परंपरा भाषा और चेतना के संबंध की बात करती है,तो उसके लिए आधुनिक अनुसंधान-पद्धतियाँ विकसित की जाएँ। और यदि किसी परंपरागत धारणा का प्रमाण न मिले, तो उसे भी वैज्ञानिक ईमानदारी से स्वीकार किया जाए। क्योंकि अनुसन्धान का उद्देश्य परंपरा को सिद्ध करना नहीं, सत्य को जानना है।Sanskrit
मेरे विचार से यही दृष्टिकोण संस्कृत को भविष्य से जोड़ सकता है। हमें संस्कृत को संग्रहालय की वस्तु नहीं बनाना है। हमें उसे जीवित संवाद, जीवित अध्ययन और जीवित अनुसंधान की भाषा बनाना है।Sanskrit
संस्कृत का एक प्रसिद्ध वाक्य है- “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।” यह केवल एक मंगलकामना नहीं है। यह उस जीवन-दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें व्यक्ति के सुख से आगे बढ़कर समस्त समाज के कल्याण की कामना की जाती है। आज संसार तकनीकी रूप से बहुत आगे बढ़ चुका है। हमारे पास ज्ञान के अभूतपूर्व साधन हैं। लेकिन शांति, संयम, नैतिकता, सहयोग और मानवीय संवेदना की आवश्यकता आज भी उतनी ही है।
ऐसे समय में संस्कृत हमें केवल अतीत नहीं देती; वह हमें ऐसी विचार-परंपरा से जोड़ती है जिसमें ज्ञान के साथ विवेक, शक्ति के साथ संयम और व्यक्तिगत उन्नति के साथ लोककल्याण को महत्व दिया गया है।अतः संस्कृत सप्ताह केवल संस्कृत के गौरव का उत्सव नहीं है। यह आत्मचिंतन का अवसर भी है। आइए, आज हम यह संकल्प लें कि संस्कृत को केवल स्मरण नहीं करेंगे,समझेंगे। केवल उसकी प्रशंसा नहीं करेंगे,उसका अध्ययन भी करेंगे। केवल उसके अतीत की चर्चा नहीं करेंगे अपितु उसके भविष्य पर अनुसन्धान करेंगे। और केवल यह नहीं कहेंगे कि संस्कृत महान है बल्कि उसके भीतर छिपे ज्ञान को तर्क, प्रयोग और अनुसन्धान के माध्यम से नई पीढ़ी के सामने रखेंगे।
अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि संस्कृत हमारे लिए केवल एक भाषा नहीं है। यह भारत की ज्ञान-स्मृति है। यह हमारी साहित्यिक परंपरा है।यह हमारी भाषिक वैज्ञानिकता का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। और यह हमारे चिंतन की एक जीवित धारा है। इस धारा को आगे ले जाने का दायित्व केवल संस्कृत के अध्यापकों का नहीं, हम सभी का है। आइए, संस्कृत को केवल गौरव की भाषा नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुसन्धान और संवाद की भाषा बनाने का संकल्प लें।









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