Jain ‘जैन’ शब्द की प्राचीनता : एक शोध

प्रो.अनेकांत कुमार जैन Jain
सारांश : अनेक लोग यह दावा करते हैं कि वर्तमान में जो जैन धर्म है उसे भगवान् महावीर के समय से ही श्रमण धर्म , आर्हत धर्म या निर्ग्रन्थ परम्परा कहा जाता रहा है तथा Jain ‘जैन’ शब्द बहुत बाद का है तथा अभी कभी प्रचलन में आया है ,इस विषयक कई वर्षों से कई लोगों ने अनेक प्रश्न उपस्थित किये हैं ,मैंने इस विषय पर कुछ खोज करने का प्रयास किया है ,तथा यहाँ प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि ‘जैन’ Jain शब्द का प्रयोग कम से कम दो हज़ार वर्ष पुराना तो है ही क्यों कि सबसे पहले आचार्य कुन्दकुन्द ने प्राकृत में इस शब्द का प्रयोग किया है, उसके भी पहले का कुछ मिल सके तथा और अधिक साहित्यिक शिलालेखीय प्रमाण मिल सकें तो अनुसन्धान के द्वार हमेशा खुले हैं ।
भूमिका
यद्यपि यह सही है कि भगवान् महावीर ही नहीं बल्कि प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के समय से ही जैन परम्परा को श्रमण धर्म , आर्हत धर्म या निर्ग्रन्थ धर्म आदि अनेक संज्ञाओं से कहा जाता रहा है ,इस विषयक अनेक जैन तथा वैदिक साहित्यिक प्रमाण भी उपलब्ध हैं । किन्तु वर्तमान में जो ‘ जैन’ शब्द प्रसिद्ध है वह भी कोई नया शब्द नहीं है उसके भी काफी प्राचीन सन्दर्भ हमें प्राप्त होते हैं ।Jain
‘जैन’ Jain शब्द की प्राचीनता का प्रश्न केवल भाषावैज्ञानिक दृष्टि से ही नहीं, अपितु जैन परम्परा की ऐतिहासिक आत्मपहचान की दृष्टि से भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ‘जैन’ Jain शब्द संस्कृत ‘जिन’ से निष्पन्न माना जाता है। जिन अर्थात् राग, द्वेष, मोह आदि आन्तरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला। अतः जिन के सिद्धान्त, शासन और आचार का अनुसरण करने वाला ‘जैन’ कहलाता है। प्राचीन जैन वाङ्मय में प्राप्त विविध प्रयोग यह प्रमाणित करते हैं कि ‘जैन’ Jain कोई आधुनिक संज्ञा नहीं, बल्कि प्राचीन काल से ही जैन Jain समुदाय और दर्शन की प्रतिष्ठित पहचान रही है।
इस दृष्टि से सर्वप्रथम आचार्य कुन्दकुन्द रचित प्रवचनसार का प्रमाण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।[1] उसमें कहा गया है—
जोण्हाणं णिरवेक्खं सागारणगारचरियजुत्ताणं।
अणुकंपयोवयारं कुव्वदु लेवो जदि वि अप्पो॥
इसकी संस्कृत छाया है—
जैनानां निरपेक्षं साकारानाकारचर्यायुक्तानाम्।
अनुकम्पयोपकारं करोतु लेपो यद्यप्यल्पः॥
यहाँ प्राकृत ‘जोण्हाणं’ का संस्कृत रूप ‘जैनानाम्’ दिया गया है। साकार और अनाकार चर्या से क्रमशः श्रावक एवं मुनि-परम्परा का ग्रहण किया जाता है। यहाँ ‘जैनानाम्’ जिन धर्म के अनुयायियों को बताया गया है।Jain
इसी गाथा की आचार्य अमृतचन्द्र कृत आत्मख्याति टीका में—
जैनेषु शुद्धात्मज्ञानदर्शनप्रवृत्तानांसाकारानाकारचर्यायुक्तेषु।[2]
प्रयोग मिलता है। अर्थात् शुद्धात्मज्ञान-दर्शन में प्रवृत्त तथा साकार-अनाकार चर्या से युक्त जैनेषु । इस प्रकार एक ही गाथा के प्रसंग में ‘जैनानाम्’ तथा टीका में ‘जैनेषु’ दोनों रूप प्राप्त होते हैं। Jain
इसी प्रकार प्रवचनसार की इसी गाथा की आचार्य जयसेन की तात्पर्यवृत्ति टीका में
‘निश्चयव्यवहारयोर्जैनागमपरिणता जैनानाम्।‘[3]
जैसा पाठ प्राप्त होता है। यहाँ ‘जैनागम’ तथा ‘जैनानाम्’ दोनों प्रयोग विशेष महत्त्व रखते हैं। इससे ‘जैन’ शब्द के केवल समुदायवाचक न होकर विशिष्ट आगमिक-दर्शनपरम्परा के नाम के रूप में प्रतिष्ठित होने का संकेत मिलता है। प्रवचनसार की टीका में आचार्य जिनसेन यह भी कहते हैं –
जिनस्य संबंधीदं जिनेन प्रोक्तं वा जैनम् ।[4]
जिन भगवान् से संबंधित अथवा जिन भगवान् के द्वारा कथित (जो लिंग, वह) जैन है ।Jain
आचार्य कुन्दकुन्द द्वारा ही प्रणीत नियमसार में ‘जैन’ शब्द का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण प्राकृत प्रयोग गाथा 139 में मिलता है। मूल गाथा इस प्रकार है-
विवरीयाभिणिवेसं परिचत्ता जोण्हकहियतच्चेसु ।
जो जुंजदि अप्पाणं णियभावो सो हवे जोगो ॥[5]
विपरीताभिनिवेशं परित्यज्य जैनकथिततत्त्वेषु ।
यो युनक्ति आत्मानं निजभावः स भवेद्योगः ॥ (संस्कृत छाया)
यहाँ मूल प्राकृत का “जोण्हकहियतच्चेसु” संस्कृत छाया में स्पष्टतः “जैनकथिततत्त्वेषु” किया गया है। अर्थात् ‘जोण्ह’ = ‘जैन’, और उसका अर्थ है जिन द्वारा कथित तत्त्वों को मानने/कहने वाले जैनों द्वारा प्रतिपादित तत्त्व। अतः इस गाथा में प्राकृत ‘जोण्ह’ और संस्कृत ‘जैन’ का सीधा भाषिक सम्बन्ध स्वयं ग्रन्थ की संस्कृत छाया से प्रमाणित होता है।Jain
इसी गाथा की व्याख्या करते हुए टीकाकार मुनिराज श्री पद्मप्रभमलधारीदेव(12 वीं शती ) लिखते हैं-
अमुं परित्यज्य जैनकथिततत्त्वानि निश्चयव्यवहारनयाभ्यां बोद्धव्यानि।
सकलजिनस्य भगवतस्तीर्थाधिनाथस्य पादपद्मोपजीविनो जैनाः, परमार्थतो गणधरदेवादय इत्यर्थः।[6]
अर्थात् उस विपरीत अभिनिवेश को छोड़कर जैनों द्वारा कथित तत्त्वों को निश्चय और व्यवहार नयों से जानना चाहिए। तथा जिन भगवान् तीर्थाधिनाथ के चरणकमलों की सेवा करने वाले जैन हैं; परमार्थतः गणधरदेव आदि इसका आशय है।
यह प्रमाण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ केवल ‘जैन’ शब्द सिर्फ आया ही नहीं है, बल्कि टीकाकार ने ‘जैन’ की व्याख्या भी की है।Jain
इसी गाथा 139 की व्याख्या के पश्चात् पद्मप्रभमलधारीदेव स्वयं वसन्ततिलका छन्द में लिखते हैं—
तत्त्वेषु जैनमुनिनाथमुखारविन्दव्यक्तेषु भवजनताभवघातकेषु।
त्यक्त्वा दुराग्रहममुं जिनयोगिनाथः साक्षाद् युनक्ति निजभावमयं स योगः॥[7]
यहाँ ‘जैनमुनिनाथ’ शब्द का प्रयोग हुआ है अर्थात् जैन मुनियों के नाथ/श्रेष्ठ मुनि। यह भी पद्मप्रभमलधारीदेव की अपनी संस्कृत रचना है।
पद्मप्रभमलधारीदेव का एक और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संस्कृत प्रयोग नियमसार की गाथा 186 के प्रसंग में मिलता है। टीका के पश्चात् वे स्वयं शार्दूलविक्रीडित छन्द में लिखते हैं—
देहव्यूहभयोराजिभयदे दुःखावलीश्वापदे
विश्वासस्तिकरालकालदहने शुष्यन्मनीर्यावने।
नानादुर्नयमार्गदुर्गमते दृङ्मोहिनां देहिनां
जैनं दर्शनमेकमेव शरणं जन्माटवीसंकटे॥[8]
इसमें अत्यन्त स्पष्ट प्रयोग है ‘जैनं दर्शनम्’ अर्थात् ‘जैन दर्शन’। यहाँ ‘जैन’ केवल किसी व्यक्ति या समुदाय का नाम नहीं, बल्कि ‘दर्शन’ का विशेषण बनकर प्रयुक्त हुआ है।Jain
नियमसार की ही गाथा 76 की टीका में पद्मप्रभमलधारीदेव ‘मार्गप्रकाश’ का उद्धरण देते हुए एक संस्कृत पद्य उद्धृत करते हैं-
कुसूलगर्भस्थितबीजसोदरं भवेद् विनाऽयं येन सुदृशोऽबोधनम्।
तदेव देवासुरमानवस्तुतं नमामि जैनं चरणं पुनः पुनः॥[9]
यहाँ ‘जैनं चरणम्’ प्रयोग हुआ है। अर्थात् ‘जैन चरण’ जैन के चरण/जैन साधु के चरण। इस श्लोक के ऊपर स्पष्टतः लिखा है “तथा चोक्तं मार्गप्रकाशे”। इसलिए इसे पद्मप्रभमलधारीदेव का मौलिक प्रयोग न कहकर उनके द्वारा उद्धृत संस्कृत साहित्य में ‘जैन’ शब्द का प्रमाण कहना अधिक उचित होगा क्यों कि उनके समक्ष मार्ग प्रकाशक नामक एक जैन संस्कृत ग्रन्थ अवश्य रहा है जिसमें यह प्रयोग था ।Jain
‘जैन’ शब्द की प्राचीनता के अनुसन्धान में आचार्य उद्योतनसूरि की कुवलयमालाकहा का प्रमाण भी विशेष महत्त्व रखता है। उद्योतनसूरि को सामान्यतः 8वीं शती का आचार्य माना जाता है और कुवलयमाला को प्राकृत गद्य-पद्यात्मक महाकथा के रूप में जैन साहित्य की महत्त्वपूर्ण रचना माना जाता है। उपलब्ध साहित्यिक स्रोत भी कुवलयमाला को उद्योतनसूरि की रचना के रूप में स्वीकार करते हैं।Jain
कुवलयमालाकहा, अनुच्छेद 280, पृष्ठ 533 पर प्रसिद्ध जैन मंगलश्लोक—
सर्वमंगलमांगल्यं सर्वकल्याणकारणम्।
प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयति शासनम्॥[10]
का उल्लेख प्राप्त होता है।
यह प्रमाण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ ‘जैनं’ शब्द सीधे ‘शासनम्’ का विशेषण बनकर आया है अर्थात् ‘जैन शासन’। इस प्रमाण का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष ‘जैनं जयति शासनम्’ है। यह आज जैन समाज में अत्यन्त प्रसिद्ध मंगलवाक्य है। उपलब्ध साहित्य में ‘जैनं जयति शासनम्’ को जैन समाज के पारम्परिक घोषवाक्य के रूप में भी उद्धृत किया गया है।Jain
किन्तु यहाँ एक प्रश्न उपस्थित होता है कि इस प्रसिद्ध श्लोक का मूल स्रोत क्या है और इसका सर्वप्रथम साहित्यिक प्रयोग कहाँ हुआ ? कुवलयमालाकहा में यदि 8वीं शती में इसका उल्लेख प्रमाणित होता है, तो यह निश्चित रूप से अत्यन्त प्राचीन साक्ष्य है; परन्तु इसे अभी श्लोक का मूलतम स्रोत घोषित करना उचित नहीं लग रहा है । इसके लिए इससे पूर्व के आगमिक ग्रन्थों, प्रकीर्णकों, स्तोत्र-साहित्य, संस्कृत-प्राकृत काव्य, शिलालेखों तथा प्राचीन पाण्डुलिपियों में इस श्लोक के पाठ का पर्याप्त अन्वेषण आवश्यक है। यदि कुवलयमाला से पूर्व इसका कोई प्रमाण प्राप्त होता है, तो ‘जैन’ शब्द तथा ‘जैन शासन’ दोनों की ऐतिहासिक परम्परा और भी प्राचीन सिद्ध हो सकती है।Jain
जैन महाकवि धनञ्जय, जिन्हें सामान्यतः ईसा की 8वीं–9वीं शती का जैन कवि माना जाता है, की संस्कृत नाममाला में ‘पादयोः पातु जैनयोः’ प्रयोग प्राप्त होता है –
द्वयं द्वितयमुभयं यमलं युगलं युगम्।
युग्मं द्वन्द्वं यमं द्वैतं पादयोः पातु जैनयोः॥[11]
इससे 8वीं शती तक ‘जैन’ शब्द का प्रयोग एक सुव्यवस्थित धार्मिक-दार्शनिक परम्परा और उसके शासन के लिए प्रतिष्ठित होने का प्रमाण मिलता है।Jain
इसके पश्चात् आचार्य सोमदेवसूरि (10वीं शती) के यशस्तिलकचम्पू में मिलता है-
सर्व एव हि जैनानां प्रमाणं लौकिको विधिः।
यत्र सम्यक्त्वहानिर्न यत्र न व्रतदूषणम्॥[12]
यहाँ ‘जैनानाम्’ स्पष्टतः जैन श्रावक श्राविका या समाज के लिए प्रयुक्त है।
आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती (10वीं–11वीं शती) के गोम्मटसार कर्मकाण्ड, गाथा 865, में भी ‘जेणाणं’ का स्पष्ट प्राकृत प्रयोग मिलता है। वहाँ परसमय और जैनमत के वचनों का विवेचन करते हुए जैनों के अनेकान्तात्मक वचन को सम्यक् कहा गया है।
परसमयाणं वयणं मिच्छं खलु होइ सव्वहा वयया।
जेणाणं पुण वयणं सम्मं खु कहंचिवयणादो॥[13]
इसका संस्कृत रूप है –
परसमयानां वचनं मिथ्या खलु भवति सर्वथावचनात्।
जैनानां पुनः वचनं सम्यक् खलु कथञ्चिद्वचनात्॥
अर्थात् अन्य मतावलम्बियों का वचन सर्वथा एकान्त ग्रहण करने के कारण मिथ्या है, जबकि जैनों का वचन अनेकान्तात्मक होने से सम्यक् है। यहाँ ‘जैनानां’ केवल किसी व्यक्ति का विशेषण नहीं, बल्कि एक जैन दार्शनिक और जैन समाज का स्पष्ट नाम है।Jain
इसके पश्चात् आचार्य हेमचन्द्रसूरि (1088–1172 ई.) के काव्यानुशासन में उल्लिखित है –
अकृत्रिमस्वादुपदां परमार्थाभिधायिनीम्।
सर्वभाषापरिणतां जैनीं वाचमुपास्महे॥[14]
इसमें ‘जैनीं वाचम्’ अर्थात् जैन वाणी/जिनवाणी का प्रयोग मिलता है।
प्राचीन जैनेतर साहित्य में ‘जैन’
प्राचीन जैनेतर साहित्य में राजा भोज के दरबार के प्रसिद्ध कवि दामोदरमिश्र (11शती अनुमानित)की रचना हनुमन्नाटकम् में शुरू में ही एक श्लोक है जिसमें सभी दर्शनों का समन्वय दिखाया गया है उसमें जैन शब्द का उल्लेख मिलता है –
यं शैवाः समुपासते शिव इति ब्रह्मेति वेदान्तिनः,
बौद्धा बुद्ध इति प्रमाणपटवः कर्तेति नैयायिकाः।
अर्हन्नित्यथ जैनशासनरताः कर्मेति मीमांसकाः
सोऽयं नो विदधातु वाञ्छितफलं त्रैलोक्यनाथो हरिः॥[15]
इससे ज्ञात होता है कि कवि को ‘जैनशासन’ एक स्वतंत्र और सुविदित धार्मिक-दर्शनिक परम्परा के रूप में ज्ञात था।Jain
सर्वदर्शनसंग्रह में जैन दर्शन के अपने परिचय में माधवाचार्य(14 शती ) लिखते हैं-
सरजोहरणा भैक्षभुजो लुञ्चितमूर्धनाः।
श्वेताम्बराः क्षमाशीला निःसङ्गा जैनसाधवः॥[16]
अर्थात् रजोहरण धारण करने वाले, भिक्षाभोजी, केशलुञ्चन करने वाले, क्षमाशील और निःसंग साधु जैनसाधव हैं।यह प्रमाण विशेष रूप से मूल्यवान है क्योंकि यहाँ ‘जैन’ और ‘साधवः’ का समास है अर्थात् जैन साधु।
सर्वदर्शनसंग्रह में ही शांकरदर्शन प्रकरण में आत्मा के स्वरूप पर विभिन्न दर्शनों के मत बताते हुए माधवाचार्य लिखते हैं –
देहपरिमाण आत्मेति जैना जिनाः प्रतिजानते।[17]
अर्थात् जैन लोग आत्मा को देह-परिमाण वाला मानते हैं; यहाँ “जैना जिनाः” दोहरा प्रयोग है ,‘जैन’ और ‘जिन’। यह अत्यन्त स्पष्ट रूप से जैनों के लिए प्रयुक्त हुआ है।Jain
इसी ग्रन्थ में रामानुजदर्शन की चर्चा करते समय कहा गया है-
रामानुजेन च जैनमतनिराकरणपरत्वेन तदिदं सूत्रं व्याकारि।[18]
अर्थात् रामानुज ने इस सूत्र की व्याख्या जैनमत के निराकरण की दृष्टि से की है।
निष्कर्ष Jain
इन प्रमाणों से स्पष्ट है किJain ‘जैन’ शब्द प्राचीन जैन परम्परा में समाज,समुदाय, मत, आगम, शासन और वाणी आदि विभिन्न अर्थक्षेत्रों में प्रयुक्त एक प्रतिष्ठित संज्ञा थी ।इसका सबसे पहला प्रयोग आचार्य कुन्दकुन्द के साहित्य में मिलता है । विशेषतः कुवलयमाला का 8वीं शती का प्रमाण इस अनुसन्धान को एक नया आयाम देता है और साथ ही यह प्रश्न भी उपस्थित होता है कि ‘सर्वमंगलमांगल्यं… जैनं जयति शासनम्’ का मूलतम साहित्यिक स्रोत कौन-सा है ? प्राचीन जैनेतर साहित्य में कवि दामोदरमिश्र (11शती)की रचना हनुमन्नाटकम् में तथा माधवाचार्य के सर्वदर्शनसंग्रह में जैन शब्द प्राप्त होता है , जैनेतर साहित्य में मिले इन प्रमाणों से भी यह सिद्ध होता है कि ‘जैन’ केवल जैनाचार्यों द्वारा अपनी परम्परा के लिए प्रयुक्त आत्मसंज्ञा नहीं थी। जैनेतर संस्कृत दार्शनिक साहित्य में भी यह शब्द जैन समुदाय और उसके दर्शन के लिए प्रयुक्त हुआ है ।Jain
सन्दर्भ
[1] आचार्य कुन्दकुन्द , प्रवचनसार, चरणानुयोग-चूलिका अधिकार, गाथा 3/51
[2] अमृतचन्द्र,समयसार/आत्मख्याति टीका , 3/51
[3] जयसेनाचार्य,समयसार/तात्पर्यवृत्ति, 3/51
[4] जयसेनाचार्य ,प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति/206
[5] आचार्य कुन्दकुन्द , नियमसार ,गाथा 139
[6] पद्मप्रभमलधारीदेव,तात्त्पर्यवृत्ति टीका गाथा 139,पृष्ठ 355
[7] पद्मप्रभमलधारीदेव,तात्त्पर्यवृत्ति टीका गाथा 139,कलश 230
[8] वही,गाथा 186,कलश 306
[9] वही,गाथा 76 की टीका
[10] उद्योतनसूरि,कुवलयमालाकहा,अनुच्छेद 280, पृ. 533
[11] धनञ्जय, नाममाला, विभाग- युग्मनाम,श्लोक 2,अमरकीर्ति-विरचित-भाष्य सहित, सम्पा. पं. शम्भुनाथ त्रिपाठी, ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी जैन ग्रन्थमाला, संस्कृत ग्रन्थांक 6.
[12] सोमदेवसूरि,यशस्तिलकचम्पू, अष्टम आश्वास, श्लोक 34
[13] नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती,गोम्मटसार, कर्मकाण्ड, गाथा 865
[14] हेमचन्द्रसूरि,काव्यानुशासन, 1/1
[15] हनुमन्नाटकम्, ,उपोद्घातः,नान्दी श्लोकाः 2
[16] सर्वदर्शनसंग्रह,सायण-माधवाचार्य / माधवाचार्य,चतुर्थ दर्शन प्रकरण,आर्हतदर्शनम् ,आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली, ग्रन्थाङ्क 51, 1928 पृ. 49-59
[17] वही, शांकरदर्शन प्रकरण
[18] वही, रामानुजदर्शन प्रकरण
दर्शनशास्त्रपीठप्रमुख
श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय
नई दिल्ली-16









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