हज़ारों युद्ध जीतने की अपेक्षा बस स्वयं को जीत लें – तीर्थंकर महावीर Mahaveera

हज़ारों युद्ध जीतने की अपेक्षा बस स्वयं को जीत लें- तीर्थंकर महावीर Mahaveera 

प्रो.डॉ.अनेकांत कुमार जैन

आचार्य-जैन दर्शन विभाग , दर्शन संकाय

श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रिय संस्कृत विश्वविद्यालय,

नई दिल्ली-16

जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर Mahaveera का जन्म चैत्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन विश्व के प्रथम गणतंत्र वैशाली गणराज्य के कुंडग्राम में ईसा की छठी शताब्दी पूर्व हुआ था ।जन-साधारण को जीव-हिंसा के पाप से बचाने तथा विश्व-शांति की स्थापना के लिए तीर्थंकर भगवान महावीर ने अहिंसा  और अनेकांत का अमर उपदेश दिया। उन्होंने यह भी समझाया कि वैचारिक मतभेदों, उलझनों और संघर्षों से बचने तथा सह-अस्तित्व की स्थापना के लिए अनेकान्तवाद ही वह मार्ग है, जो मानवता को विभाजन से बचाकर समन्वय की ओर ले जाता है। वास्तव में, अनेकान्त भारत की वैचारिक अहिंसा का सर्वोच्च रूप है।Mahaveera

अनेकान्त हमें केवल सहिष्णुता ही नहीं सिखाता, बल्कि यह भी सिखाता है कि विरोधी विचारों के साथ हमारा व्यवहार कैसा हो। वस्तु के स्वाभाविक रूप से विरोधी यथार्थ स्वरूप को जानने की सम्यक् दृष्टि ही अनेकान्त है। चिंतन की अहिंसामयी प्रक्रिया का नाम अनेकान्त है और उसकी अभिव्यक्ति की शैली स्याद्वाद है। अनेकान्त हमें सिखाता है कि एक ही वस्तु में परस्पर विरोधी धर्म भी विद्यमान रहते हैं। यह हमारी बुद्धि को संकीर्णता से निकालकर समग्रता की ओर ले जा सकता है और सत्य के व्यापक स्वरूप से परिचित करा सकता है।Mahaveera

भगवान महावीर ने अहिंसा में ही विश्व-कल्याण का दर्शन किया। उनकी अहिंसा की शक्ति इतनी प्रखर और प्रभावशाली थी कि शेर और गाय जैसे स्वभावतः विरोधी जीव भी उनके सान्निध्य में शांत और अहिंसक हो जाते थे। उनकी अहिंसा का विस्तार केवल मनुष्य या पशु-पक्षियों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वह सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव—कीट-पतंग, वनस्पति, वृक्ष और लताओं तक व्याप्त था। यह करुणा का वह विराट रूप है, जो समस्त सृष्टि को अपने आलिंगन में ले लेता है।Mahaveera

महावीरMahaveera का जीवन आत्म-संघर्ष का अनुपम उदाहरण है। उनका संघर्ष किसी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र के विरुद्ध नहीं था, बल्कि अपने ही कर्मों और आंतरिक दुर्बलताओं के विरुद्ध था। उन्होंने सर्वप्रथम अपनी इन्द्रियों और अंतर्मन की बुराइयों पर विजय प्राप्त की, अपने कर्मों का क्षय किया और इसी कारण वे ‘जिनेंद्र’ कहलाए। उनके लिए कोई व्यक्ति बुरा नहीं था, केवल बुराइयाँ ही बुरी थीं। यही दृष्टि आज के विभाजित और संघर्षग्रस्त विश्व को चाहिए।Mahaveera

प्राकृत के जैन आगमों में एक अमर सूत्र आता है—

जो सहस्सं सहस्साणं, संगामे दुज्जए जिणे।

एयं जिणेज्ज अप्पाणं, एस मे परमो जओ।।Mahaveera 

अर्थात्, हज़ारों युद्धों में असंख्य शत्रुओं को जीतने से भी श्रेष्ठ वह है, जो स्वयं को जीत लेता है; वही परम विजय का अधिकारी है।Mahaveera

अनेकान्त दर्शन यह उद्घोष करता है कि इस संसार में विरोधी तत्व भी साथ-साथ अस्तित्व में रह सकते हैं। एक का अस्तित्व दूसरे को नष्ट नहीं करता, बल्कि दोनों मिलकर एक व्यापक सत्य की रचना करते हैं। यही सह-अस्तित्व भारतीय संस्कृति की जीवन-धारा है, और यही अहिंसा का मूल स्रोत भी है।

जब हम यह स्वीकार करते हैं कि दो विरोधी तत्व बिना एक-दूसरे को हानि पहुँचाए भी अस्तित्व में रह सकते हैं, तब अहिंसा का वास्तविक बीज अंकुरित होता है। यही विचार आज के विश्व के लिए अत्यंत आवश्यक है।Mahaveera

वास्तव में, सह-अस्तित्व की भावना विकसित किए बिना विश्व-शांति संभव नहीं है, और सह-अस्तित्व की कल्पना अनेकान्त दृष्टिकोण के बिना अधूरी है। विश्व-शांति का अर्थ केवल युद्ध का अभाव नहीं, बल्कि एक ऐसे नवीन विश्व का निर्माण है, जहाँ राष्ट्रों के बीच परस्पर सद्भाव, सहयोग और समभाव हो। “सिर्फ मैं नहीं, बल्कि हम और हम सभी”-यही सह-अस्तित्व का उद्घोष है।Mahaveera

भगवान् महावीर के अनुसार युद्ध सिर्फ एक समस्या है ,हम सभी की भूल यह है कि हमने उसे समाधान का एक हिस्सा भी मान रखा है,युद्ध से सिर्फ नाश होता है मनुष्य का विकास नहीं होता ।भगवान् महावीर के शुद्ध उपदेश ही युद्ध प्रवेश से बचा सकते हैं ,उनके अनेकांत, अहिंसा आदि सिद्धांतों को अपनाएं तो सभी समस्याएं हल हो सकती हैं  और  जगत में स्थाई शांति स्थापित हो सकती है ।Mahaveera

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