Mahaveer Charit महावीर चरित

Tirthankara Mahavir

 

Mahaveer Charita महावीर चरित

आयरिय- अणेयंतजइणविरइयं

तित्थयर-महावीर-चरियं Mahaveer Charita

(तीर्थंकर महावीर चरित  )

 

णमो जिणाणं

पुप्फोतराभिहाणा तिेसिलागब्भासाढसिदछट्ठम्मि

अवइण्णमहावीरो तित्थयरो य जइणधम्मस्स ।।।।

स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान से च्युत होकर आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन माता त्रिशला के गर्भ में जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर अवतरित हुए ।Mahaveer Charit

तत्थ अट्ठदिवसाहिय णवमासपुण्णकरिदूण विदेहे 

वेसालीकुण्डउरे णाहसिद्धत्थनंदवत्ते   ।।।।

भगवं सुजम्मइसाएणवणवइपंचसयवस्सपुव्वम्मि ।

चेत्तसिदतेरसीए सुहे उत्तरफग्गुणिरिक्खे ।।।।

गर्भ में नौमाह आठ दिन पूर्ण करके भारत वर्ष के विदेह देश के वैशाली कुंडनगर में नाथ वंशी राजा सिद्धार्थ के नान्द्यावर्त नामक महल में ईसा के पांच सौ निन्यानबे (५९९)वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल त्रियोदशी के दिन शुभ उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र में भगवान् महावीर का शुभ जन्म हुआ।Mahaveer Charit

                              अट्ठोतरीयदोसयगयवस्साणिपासोप्पत्तीदो ।

महावीरस्स जम्मं  होही खलु पुणधम्मठविउं ।।४।।

तेइसवें तीर्थंकर भगवान् पार्श्वनाथ की उत्पत्ति से दो सौ अठहत्तर वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद धर्म की पुनः स्थापना के लिए तीर्थंकर महावीर का जन्म हुआ ।

दट्ठूण सिंहचिण्हं वीरदाहिणपायंगुट्ठणहम्मि ।

होहिइ खलु तित्थयरो णायगवरमोक्खमग्गस्स ।।५।।

उस दिव्य बालक वीर के दाहिने पैर के अंगूठे के नाखून पर सिंह का चिन्ह देख कर (यह भविष्यवाणी कर दी गयी थी कि)निश्चित ही ( यह बालक धर्म तीर्थ का कर्त्ता )तीर्थंकर और  मोक्षमार्ग का श्रेष्ठ नेता होगा ।

सिंहवीरचिण्हमत्थि,तत्तो च तित्थयरमहावीरस्स ।

वेसालिथम्भस्स खलु पडीयभारयसरयारस्स  ।।६।।

तब से ही सिंह निश्चित ही तीर्थंकर महावीर का और वीरता का चिन्ह है तथा आज वैशाली का सिंह स्तम्भ भारत सरकार का प्रतीक है ।Mahaveer Charit

पढमे खलु गणतंते वेसालीए होही जस्स जम्मं ।

धम्मदंसणे ठवीअ वि गणतंतं य महावीरो  ।।७।।

निश्चय ही विश्व के प्रथम गणतंत्र वैशाली में जिनका जन्म हुआ और उन भगवान् महावीर ने धर्म दर्शन के क्षेत्र में भी गणतंत्र की स्थापना की ।Mahaveer Charit

अप्पा सो परमप्पा णत्थि कोवि एगो इस्सवरो लोए ।

णत्थि कोवि कत्ता खलु ,लोअस्स य केवलं णाया ।।८।।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक आत्मा परमात्मा है ,लोक में कोई एक ईश्वर नहीं है ,निश्चित ही इस लोक का कोई भी कर्त्ता नहीं है और वह परमात्मा केवल ज्ञाता (दृष्टा) है ।

जीवसयमेव कत्ता,सुहदुक्खाणं य सयं कम्माणं ।

सव्वकम्मनस्सिदूण, भत्तो वि य भगवन्तो हवइ ।।९।।

(उन्होंने समझाया कि) अपने सुख-दुखों का और अपने कर्मों का जीव स्वयमेव कर्त्ता है, अपने सभी कर्मों का नाश करके भक्त भी भगवान् हो जाता है ।Mahaveer Charit

रायविसयभोयत्तो विरत्तभावो य बालकालत्तो ।

मणुभवो भवणट्ठउं अत्थि सो सगपरकल्लणउं ।।१०।।

वे राज पाठ के सुख और विषय भोगों से बाल्यकाल से ही विरक्त भाव वाले थे (उसका कारण यह था कि) उन्होंने समझ लिया था कि यह मनुष्य भव संसार का अभाव करने के लिए तथा स्वपर कल्याण के लिए है ,(न कि इन्द्रिय विषय सुखों में रमने के लिए) ।Mahaveer Charit

विरत्तरायभवणेवि तीसवस्सेसु य कुमारकालम्मि।

वेरग्गवड्ढमाणं  कायसत्तहत्थसुवण्णेवि।।११।।

वर्धमान कुमारा अवस्था के तीस वर्षों में राजभवन में भी विरक्त भाव से रहे और सात हाथ प्रमाण लम्बा सुन्दर सुवर्ण वर्ण युक्त शरीर होते हुए भी उनका वैराग्य ही वर्धमान होता रहा ।Mahaveer Charit          

          ण हि तं रज्जं करीअ सुमरेउं णियपच्छिमजम्माणं ।

     उत्तरफग्गुणिरिक्खे गिण्हिअ दिक्खा य णाहवणे ।।१२।।

          तवो य गिण्हिअ वीरो मग्गसिरकिण्हदसमीअवरण्हे ।

तिण्णि य उववासेहिं एक्को हवीअ दीअंबरो ।।१३।।

उन्होंने राज्य नहीं किया तथा पूर्व जन्म का स्मरण करके नाथ वन(वैशाली का समीपवर्ती उपवन ) में मगसिर कृष्णा दसमी के दिन अपरान्ह काल में उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र के रहते तीन उपवासों के साथ दीक्षा और तप ग्रहण करके अकेले ही दिगंबर हो गए ।Mahaveer Charit

    

 

          वीरछदमत्थकाले करिउं मोणतवबारसवस्साणि ।

    गओ जिम्हियसमीवे पडिमा य रिउउलणइतीरे ।।१४।।

वीर मुनि छद्मस्थ काल में बारह वर्षों तक मौन तप करके जिह्मिक ग्राम के समीप ऋजुकूला नदी के किनारे गए और प्रतिमा योग धारण कर लिया  ।

          वइसाहसुक्कदसमी हत्तरिक्खे सुहकालावरण्हे ।

घाइकम्मणसिदूण य लहीअ वीरकेवलणाणं ।।१५।।

भगवान् महावीर ने समस्त घाति कर्मों का नाश करके वैसाख शुक्ला दसमी के दिन हस्त नक्षत्र के रहते शुभ अपरान्ह काल में केवलज्ञान प्राप्त किया ।

                            जणीअ पसीअ सव्वं , ववहारणएण तिलोयतिक्कालं ।

                            सव्वण्णमहावीरो     सुद्धेण य सुद्धाप्पाणं ।।१६।।

(केवलज्ञान के अनंतर )सर्वज्ञ भगवान् महावीर व्यवहार नय  से तीनों लोकों और तीनों कालों के सभी द्रव्यों की सभी पर्यायों को जानते देखते थे और शुद्ध नय से अपनी शुद्धात्मा को जानते देखते थे ।Mahaveer Charit

      छसट्ठिदिवाणंतरं,तए देसणा खिरीअ रायगिहम्मि ।

जए य गोयमगणहरो, आगच्छीअ समवसरणम्मि ।।१७।।

केवलज्ञान होने के छियासठ(६६)दिन के अनंतर भगवान् महावीर की देशना राजगृह के विपुलाचल पर्वत पर तब खिरि जब उनके प्रधान शिष्य गणधर गौतम समवशरण में आ गए ।Mahaveer Charit

         तत्थ गिरिविउलाचले य सावणकिण्हपडिवदावरण्हे ।

खिरीअ पढमदेसणा, सव्वाणं पागदभासाए ।।१८।।

राजगृह के विपुलाचल पर्वत पर श्रावण कृष्णा प्रतिपदा के दिन अपरान्ह काल में सभी जीवों के कल्याण के लिए वीर प्रभु की प्रथम देशना दिव्य प्राकृत भाषा में खिरी ।Mahaveer Charit

वीरसासणदिअसो य तत्तो पसिद्धो णाणवीराणं ।

    तीसवस्स पज्जंतं  धम्मतित्थस्स य पवत्तणं ।।१९।।

तब से ही प्रथम देशना का यह दिन वीर शासन जयंती के रूप में प्रसिद्ध हुआ तथा तब से ही वीर प्रभु द्वारा प्रदत्त तत्त्वज्ञान प्रसिद्ध हुआ और उन्होंने तीस वर्ष तक धर्म तीर्थ का प्रवर्तन किया ।Mahaveer Charit

जआ अवचउकालस्ससेसतिणिवस्ससद्धअट्ठमासा ।

    तआ होहि अंतिमा य महावीरस्स खलु देसणा ।।२०।।

जब अवसर्पिणी के चतुर्थकाल के तीन वर्ष साढ़े आठमास शेष थे तब भगवान् महावीर की अंतिम देशना हुई थी ।Mahaveer Charit

                          कत्तियकिण्हतेरसे जोगणिरोहेण ते ठिदो झाणे ।

वीरो अत्थि य झाणे अओ पसिद्धझाणतेरसो ।।२१।।

योग निरोध करके कार्तिक कृष्णा त्रियोदशी को वे (भगवान् महावीर)ध्यान में स्थित हो गए और (आज) ‘वीर प्रभु ध्यान में हैं’ अतः यह दिन ध्यान तेरस के नाम से प्रसिद्ध है ।Mahaveer Charit

                            चउदसरत्तिसादीएपच्चूसकाले पावाणयरीए

ते  गमियपरिणिव्वुओदेविहिं अच्चीअ मावसे ।।२२।।

चतुर्दशी की रात्रि में स्वाति नक्षत्र रहते प्रत्यूषकाल में वे (भगवान् महावीर)परिनिर्वाण को प्राप्त हुए और अमावस्या को देवों के द्वारा पूजा हुई ।Mahaveer Charit

गोयमगणहरलद्धं अमावसरत्तिए य केवलणाणं

णाणलक्खीपूया य दीवोसवपव्वं जणवएण।।२३।।

इसी अमावस्या की रात्रि को गौतम गणधर ने केवल ज्ञान प्राप्त किया ।लोगों ने केवल ज्ञान रुपी लक्ष्मी की पूजा की और दीपोत्सवपर्व  मनाया ।Mahaveer Charit

कत्तिसुल्लपडिवदाए देविहिं गोयमस्स कया पूया ।

णूयणवरसारंभो वीरणिव्वाणसंवच्छरो  ।।२४।।

अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को देवों ने भगवान् गौतम की पूजा की और इसी दिन से वीर निर्वाण संवत और नए वर्ष का प्रारंभ हुआ ।Mahaveer Charit

 

                                                    णमो वीर जिणा

प्रो अनेकांत कुमार जैन

आचार्य – जैनदर्शन विभाग

श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय

नई दिल्ली -110016 Mahaveer Charit

Tags

Read More

Solahkaran bhavna

Teerthanker Rishabhdeva : तीर्थंकर ऋषभदेव का ‘सनातन’ जैनधर्म

Read More

काशी की पाण्डित्य परंपरा के विद्वत्-रत्न हैं :आचार्य फूलचन्द्र जैन प्रेमी Prof.Phoolchand Jain Premi

Read More

A Life Dedicated to Indian Knowledge : The Interdisciplinary Contributions of Prof.Phoolchand Jain ‘Premi’

Read More

Leave a Comment

Recommended Posts

Tirthankara Mahavir

Mahaveer Charit महावीर चरित

Solahkaran bhavna

Teerthanker Rishabhdeva : तीर्थंकर ऋषभदेव का ‘सनातन’ जैनधर्म

काशी की पाण्डित्य परंपरा के विद्वत्-रत्न हैं :आचार्य फूलचन्द्र जैन प्रेमी Prof.Phoolchand Jain Premi

A Life Dedicated to Indian Knowledge : The Interdisciplinary Contributions of Prof.Phoolchand Jain ‘Premi’

भारतीय ज्ञान परंपरा IKS में प्राकृत भाषा का नया वर्ष

PAGADA BHASA पागद भासा (The First Magazine in Prakrit Language ) July – Dec 2025 अंक

PAGADA BHASA पागद भासा(The first magazine in prakrit language ) , जनवरी – जून 2025 अंक

Top Rated Posts

Recommended Posts

Tirthankara Mahavir

Mahaveer Charit महावीर चरित

Solahkaran bhavna

Teerthanker Rishabhdeva : तीर्थंकर ऋषभदेव का ‘सनातन’ जैनधर्म

काशी की पाण्डित्य परंपरा के विद्वत्-रत्न हैं :आचार्य फूलचन्द्र जैन प्रेमी Prof.Phoolchand Jain Premi

A Life Dedicated to Indian Knowledge : The Interdisciplinary Contributions of Prof.Phoolchand Jain ‘Premi’

error: Content is protected!